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Thursday, April 2, 2020

मैं यूं ही बेटी नहीं कहलाती


🍁मैं यूं ही बेटी नहीं कहलाती 🍁


मैं यूं ही बेटी नहीं कहलाती
जहां लोग मेरे जन्म को ही 
लक्ष्मी का वास मानते है 
लाडो बिटिया लाडली तो कभी
बेटी नाम से जानते है
महज 
मेरे चरण स्पर्श को सौभाग्य मानते है
मुझे इस संसार में बहू बेटी बहन 
और 
मां के रिश्ते से पहचानते है 


मै यूं ही बेटी नहीं कहलाती
मेरी हंसी किलकारी
घर को उजागर कर जाती है
हर बेटी अपने आंगन की 
फुलवारी कहलाती है
एक पिता के जीने की वजह बन जाती है
पर न जाने फिर भी 
बेटी पराया धन कहलाती है 
बेटी की कमी किसी को महसूस हो या ना हो
पर एक पिता को
उसकी कमी खालती जाती है
और एक बेटी कितनी भी दूर हो पर
वो हर हाल में बेटी होने का फ़र्ज़ निभाती है

मैं यूं ही बेटी नहीं कहलाती
हर बेटी पिता के कहानियों की 
रानी कहलाती है
खुशियों की रवानी ढूंढ़ लाती है
पर
मेरी हर कहानी एक अलग किरदार निभाती है
कभी महिषासुर मर्दनी दुर्गा 
कभी कान्हा की दीवानी राधा
तो कभी 
अंगेजो को ललकारती झांसी की रानी
नजर आती है


मैं यूं ही बेटी नहीं कहलाती
अपनी ही लड़ाई में अकेली रह जाती है
मुश्किल घड़ी में कोई राह नजर न आती है
मगर
ये दुनिया मेरे ही चरित्र पर 
सवाल उठाती है
हर बार
खुद को साबित करने के लिए 
सीता बनकर अग्नि परीक्षा दिलाती है
फिर भी ये समाज 
मेरे ही आबरू पे दाग लगाती है
और महज 
कुछ दहेज के लालच में
मेरे तन को आग जलाती है
ये सब सुन मेरी सांसे थम सी जाती है
आंखे हर बार भर सी आती है 


मैं यूं ही बेटी नहीं कहलाती
एक बेटी ये सवाल हर बार दोहराती है
मेरी काशुर ही क्या रह जाती है 
जो मुझे कोख में ही मार दी जाती है 
बस मै लड़की हूं इसलिए 
किसी गटर या नाली में फेक दी जाती है
मेरी ख्वाहिशों को पैदा होने से पहले 
कुचल दी जाती है
एक कली को फूल बनने से पहले 
तोड़ दी जाती है 


मैं यूं ही बेटी नहीं कहलाती
अपने ही घर में बंदी बन रह जाती है
गली सड़क मुहल्लो में अब 
अकेली चल न पाती है 
क्योंकि ये
हैवान 
हर जगह नजर आती है
दो चार दिन पीछा करने के बाद
प्यार का प्रस्ताव रख दी जाती है
और
मेरी इनकार उन
हैवानों पर भारी पड़ जाती है
तभी तो 
मेरे शरीर में तेजाब डाल दी जाती है
तब भी ये समाज 
आवाज न उठाती है 
उन हैवानों की 
हिम्मत और बढ़ जाती है
उनके हाथ मेरे आबरू तक पहुंच आती है
सरेआम मेरी इज्ज़त को
तार तार कर जाती है
मेरे चरित्र पर दग लगा दी जाती है
इसके बावजूद 
ये समाज मेरे ही कपड़ो पे
सवाल उठाती है 
तब भी
मेरी आवाज़ को कहीं दबा दी जाती है
और जो 
उठ खड़ी होती अपनी 
लड़ाई के लिए वो 
कलयुग की निर्भया कहलाती है
मैं यूं ही बेटी नहीं कहलाती


Writer By :-
Aateshwar Nishad